Tuesday, 8 June 2021

सौगात

बिजलियाँ
सहरां में
राही की सौगात लिये
चली आ रही है मेरे साथ
प्यास हलक तक
और चेहरे पे मुस्कान लिये
चला जा रहा हूँ मै
सहरां से सहरां तक
पहलू में रूह के सिवा
धडकन भी है 
अमानत मेरे पास
जज़बों की आग झुलस कर
कतरा कतरा बन चुका है ज़ेहन 
छालों ही के जूतों में पैर रखकर
चला जा रहा हूँ मै
मंजिल
तेरी आहट न होने दे मुझे कभी 
अबादत के आखरी पल तक 
चलना है मुझे
काइनात की शाईस्तगी को
बदलना है मुझे
तूफान की सॉंय सॉंय
कानों में गूंजती नहीं अब
पत्थरों से भूख मिटाये
चला जा रहा हूँ मै 
आगोश में धूप के 
अब गर्मी नहीं 
आफ़ताब को आँचल बना
चला जा रहा हूँ मैं 
सांसों तले रौंदी हुई 
मेरी शख्सियत 
जेहन के फफ़स से अब कोसो दूर
मुझे पुकारती हुई 
सितारों के गिर्द कहीं
खोज की चाहत लिये
चला जा रहा हूँ मै
अपने उद्देश्य की राह पर, 
लड़खड़ाता हुआ | 
बेरहम पैर 
मखमली दालन की चाह में
चलने से इन्कार कर चुके हैैं,
विचारों की प्रस्तर राह पर
'आदर्श' तेरी प्रतिभा से लिप्त
मै चला आ रहा हूँ, मेरी प्रतिक्षा कर
कवि'रवि'


0 Comments:

Post a Comment

Subscribe to Post Comments [Atom]

<< Home