Tuesday, 8 June 2021

एहसास

गेसूं बहक पड़े तो
महक तलब हुई
अपने लिये वाईज़
तब वो खाक थी
एक ख्वाहिश के लिये 
जिये नाकाम जिंदगी
मरने के वक्त भी
मुझे मरने की चाह थी
मुझे अबादत पे मेरी
था इतना प्यार
खाक में मिलने पर भी
 उजागर है मेरी मज़हार
अपनों को संजोनें में
सपनों की गिरायी लाश
हकीकत तो साफ थीं
फिर भी की खुद्दारी तलाश 
आज इस दश्त में तन्हा, 
पर तन्हा नहीं हूँ आज
औरों की वजह से कल था 
में मेरा ही हूँ आज
कवि'रवि'

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