एहसास
गेसूं बहक पड़े तो
महक तलब हुई
अपने लिये वाईज़
तब वो खाक थी
एक ख्वाहिश के लिये
जिये नाकाम जिंदगी
मरने के वक्त भी
मुझे मरने की चाह थी
मुझे अबादत पे मेरी
था इतना प्यार
खाक में मिलने पर भी
उजागर है मेरी मज़हार
अपनों को संजोनें में
सपनों की गिरायी लाश
हकीकत तो साफ थीं
फिर भी की खुद्दारी तलाश
आज इस दश्त में तन्हा,
पर तन्हा नहीं हूँ आज
औरों की वजह से कल था
में मेरा ही हूँ आज
कवि'रवि'

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