असहाय
तन्हाई में अक्सर वह झुलसता रहता है,
टपकता हुआ खून बेरंग |
यादों का मंथन और चरमराते हुए होंठ
उत्सर्ग होती है असहायता |
कलम की तलवार लिये
लकीरों को काटता हुआ
उडाये हुए छींटों जैसा
एक कोरे कागज पर वो लिखता रहता है
अपना अधूरा जीवन
कठपुतलीयों के आगाह में बदसूरत सा उकसाने पर नाच नहीं सकता
पराजित फिरभी अविचल.... अविचल
कवि'रवि'

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