इश्क नासूर
खुले दरीचे से
उसकी एक झलक ही नजर आई
खुदा गवाह है मेरी जान निकल गई पलके झपकाते हुये मिलाई जब उसने नजर
जेहन के कफ़स से मेरी रूह निकल गई
लोग कहते हे बंद दरीचों से भी सदा आती है उम्र बालीग हो तो
दिल चुराने की अदा आती है
जब उसके रुक्सार का होता है दीदार
प्यार के नग़मे लबों पे होते हैं सवार गुनगुनाता हुआ मैं फिरुं गली कूचों में
उसके गेसूंओं की महक ले के हवा आती है मुहब्बत कर न ले
मुझ जैसा नादान न बन
टूट जाता है दिल जब भी
दुवा न दवा काम आती है।
कवि'रवि'

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