मिलन
इक नजर का असर है ये
के सागरो मीना मिल जाय
इक आह का असर है ये
के दरो दीवार टूट जाय
इक मुस्कान से तुम्हारी
छा जाती है बहार खिजाँ पे
इक लफ्जे उल्फत से तुम्हारी
मेरी हिकायत लूट जाय
चाहीये तुम्हे तो करो कुछ ऐसा
मेरी रूह तेरे जिसम मे घुल जाय।
कवि'रवि'

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