Friday, 2 July 2021

तिश़नगी और सफ़र

तिश़नगी अब तो
दिलों जां में बसर करती है
हो ग़मगीन अगर दिल तो 
कुछ और भी असर करती है

मेरी तन्हाई मेरे मर्ज़ का सामान बन
जख़्मों पे नमक का किरदार अदा करती है

ग़मे जिंदगी को बस इतना ही गुमान है
ज़ेहन पर होके सवार सांसें सफ़र करती है

दिल दिमाग और शरीर की
हैसियत क्या है 'रवि'
जब आत्मा से उठती लहरें
ब्रह्मांड का सफ़र करती है

कवि'रवि'


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