तिश़नगी और सफ़र
तिश़नगी अब तो
दिलों जां में बसर करती है
हो ग़मगीन अगर दिल तो
कुछ और भी असर करती है
मेरी तन्हाई मेरे मर्ज़ का सामान बन
जख़्मों पे नमक का किरदार अदा करती है
ग़मे जिंदगी को बस इतना ही गुमान है
ज़ेहन पर होके सवार सांसें सफ़र करती है
दिल दिमाग और शरीर की
हैसियत क्या है 'रवि'
जब आत्मा से उठती लहरें
ब्रह्मांड का सफ़र करती है
कवि'रवि'

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