तड़प
कुछ भी नहीं बचा है,
लो, अब खून ही पी लो ।
मजे से जीते आये हो,
कुछ और भी जी लो ॥
मरता है किसान ?
मरने दो,
जलते है मकान
जलने दो।
आबाद है जब तक
तुम्हारा जहान,
तुम जींदगी के मजे ले लो ॥
सङ्क के उसपार
तोड़ो वो झुग्गियाँ,
बदलो वो दुनिया।
वहाँ भी छुपा है
तुम्हारे ऐश का सामान,
लूटकर ले लेलो
सत्तर सालों बाद अब
बूढी हो चली है आजादी।
उसकी हस्ती का अब
यहाँ क्या काम,
उसे दफनाकर मिटा डालो
कहानियों में मरे होंगे
राक्षस उस ज़माने के
इन सदीयों के मायावी हो तुम,
करो कत्ले आम और वाहवाही लो
अगर जरा भी बची है
इन्सानियत तुम्हारे जेहन में ।
मरने से पहले कुछ ऐसा भी कर लो
मरतों का सलाम ले लो
कवि'रवि'

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