Tuesday, 15 June 2021

इन्तज़ार

आखरी लम्हों में इकबार जी लूँ 
जी लेने दो | 
होठों से नहीं, इक बार आँखों से पी लूँ 
पी लेने दो ॥
तेरे दर की दहलीज भी तंग नजर, 
पार करने को करूँ ठुकराती है।
दरीचे से ही करूँ तेरे दीदार,
कर लेने दो
मेरी हस्ती में मुझे तू नज़र आता है
खुद को तडपाता हरबार । 
तेरे हिस्से की मार मैं खा लूं 
खा लेने दो ॥
दीन को रात में तब्दील कर
करूँ शाम से सहर का इंतजार, 
मुझको भाती है सन्नारों की पुकार, 
सुन लूँ सुन लेने दो
कवि 'रवि'

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