इन्तज़ार
आखरी लम्हों में इकबार जी लूँ
जी लेने दो |
होठों से नहीं, इक बार आँखों से पी लूँ
पी लेने दो ॥
तेरे दर की दहलीज भी तंग नजर,
पार करने को करूँ ठुकराती है।
दरीचे से ही करूँ तेरे दीदार,
कर लेने दो
मेरी हस्ती में मुझे तू नज़र आता है
खुद को तडपाता हरबार ।
तेरे हिस्से की मार मैं खा लूं
खा लेने दो ॥
दीन को रात में तब्दील कर
करूँ शाम से सहर का इंतजार,
मुझको भाती है सन्नारों की पुकार,
सुन लूँ सुन लेने दो
कवि 'रवि'

0 Comments:
Post a Comment
Subscribe to Post Comments [Atom]
<< Home