Sunday, 27 June 2021

शाम ढलती है

शाम ढलती है
अखियों की नज़र में..... रात चली आती है
सांवला जिस्म 
जहां को आगोश में भर लेता है, 
सहमा सहमा सा हर पल 
चुपके-चुपके खिसकता रहता है
सहर की ओर, शफक़ की आस में
मैं और मेरी तन्हाई 
संवारने लगते है टूटे सपनों को
मन डरता रहता है कहीं
फिर सहर न हो जाए फिर सहर न हो जाए
कवि'रवि'

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