शाम ढलती है
शाम ढलती है
अखियों की नज़र में..... रात चली आती है
सांवला जिस्म
जहां को आगोश में भर लेता है,
सहमा सहमा सा हर पल
चुपके-चुपके खिसकता रहता है
सहर की ओर, शफक़ की आस में
मैं और मेरी तन्हाई
संवारने लगते है टूटे सपनों को
मन डरता रहता है कहीं
फिर सहर न हो जाए फिर सहर न हो जाए
कवि'रवि'

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