Sunday, 20 June 2021

एक कहानी प्रेम कहानी

घर के एक कोने में पड़ी वो किताबों वाली रैक पर अनायास ही नज़र पड़ी और धक् से मेरा दिल ४० वर्ष पुरानी यादों में पहुंचा। क्या क्या और कितना बयान करूं, वो उम्र का तकाजा था, वो कालेजियन मंज़र, वो मस्तियां, वो अखबारों की सुर्खियां, वो युवा मंचों से उठने वाली जोश भरी दहाडें। रोमांचित करने वाली वो शाम के कट्टे पर की मुलाकातें, हर दिन हर पल जैसा हाथ से फिसल न जाएं इसकी चिंता। राजनीति में होने वाली उथल-पुथल मन मस्तिष्क को झकझोर देती थी। कभी लगता था कूद पड़ूं उस यज्ञ में, अपने अंदर के लाव्हा को बहने दूं बेतरतीब। लेकिन, तभी हमारे सिनियर्स की वो तजुर्बे वाली बात की 'ठहरो'! पहले अपनी शिक्षा पूरी करो, इस देश को अनाड़ी नहीं सुशिक्षित युवा चाहिए, अपने अंदर के लाव्हा को मुहाने पर ही रोकने में सक्षम हुआ करती थी। 
वैसे तो अपना दिमाग पैलवान किस्म का था और ज्यादातर ध्यान केंद्रित रहता था शरीर कमाने में, तो वाजिब है कि किताबों से दोस्ती थोडी कम ही हुआ करती थी। लेकिन एक दौर ऐसा भी आया, वो एक दिन अचानक से कालेज में फर्स्ट पिरियड से पहले ही क्लास में घुसते घुसते मुझे बोली "एक प्रश्न का उत्तर चाहिए' दोगे? मैं जो किसी कन्या को देखने में ही झेंप जाता था, अकस्मात यह मोहक आवाज से और उसका रुख मेरी तरफ देख कर चकरा गया। 
मैंने फिर भी धीरज बांधते हुए पूछा ' कौन सा प्रश्न'? 
उसके चेहरे पर की मुस्कान और खिल गई और उसने कहा ' कल परांजपे सर ने जो सिखाया है, क्या उसकी नोट्स दोगे?
प्रश्न सीधा सा था,मगर किसी बमबारी से कम भी नहीं था। मेरे लिए अब उपप्रश्न ये था कि इसे क्या बताऊं। हमारी नोटबुक्स तो केवल इस वजह से पहचानी जा सकती थीं कि उनपर बनाने वाले ने छाप कर रखा था "नोटबुक"। वरना न हमने कभी उसके पन्ने खराब करने का गुनाह किया था न कभी व्याख्याता, प्राध्यापक ने ही हिम्मत करी थी कि हमसे कुछ पूछें। इस उधेड़बुन में क्लास के दरवाजे पर मैं निस्तब्ध सा खडा था और पीछे सभी स्टुडेंट्स आ कर रास्ता मिलने की अपेक्षा में आ खडे थे। तब जो हुआ सो हुआ, लेकिन दूसरे दिन कालेज में हवा फैल गई कि मुझमें और उसमें कुछ कुछ चल रहा है। कालेज में एंट्री करते बराबर देखा कि हर कोई विशेष हाय बाय कर रहा है। जिस की कतई उम्मीद नहीं हुआ करती थी, वो आज हो रहा था। हमारी सिनियर लेक्चरर मैडम ने भी मेरी तरफ विलक्षण नज़र से देखा तब तो मैं पूरी तरह घबरा गया कि आखिर आज यह सब है क्या।
आज फिर से ठीक उसी तरह उसका वही प्रश्न कानों पर पडा और मैं सर्द हो गया। उसकी वो ज़ालिम नज़र मानो तीर सी चुभ रही थी, और मुझे और भी घायल कर रही थी। लेकिन मैंने अपने पैलवान दिमाग को ललकारते हुए बजाया कि नहीं इस तरह तुम्हें कोई चितपट नहीं कर सकता। उधार कि मुस्कान चेहरे पर लाते हुए मैंने कहा, 'हाय'! नहीं मैं अक्सर नोटबुक में कुछ लिखकर रखने में विश्वास नहीं रखता! मैं जो कुछ भी है 'बाय हार्ट' करता हूं।
मुझे लगा मैंने बाजी मारी लेकिन नहीं, तभी उसने मुझे कहा 'शाम को मिलें'! 
रंग उड़े चेहरे से मैंने पूछा किसलिए? तो उसने नया तीर दागा ' आपके इस हार्ट की सर्जरी कर के मुझे नोट्स निकालनी है'। बाहर क्लास के सभी लड़के लड़कियां "फुल्ल मज़े में" मेरा रंग उडता देख कर। मैंने फिर हिम्मत बांधी और कहा मेरा शाम का वक्त वर्जिश का होता है और मैं जिम में रहता हूं। मुझे लगा अब तो मैंने उसे बोल्ड कर दिया है, लेकिन वो भी क्या बेखौफ कि कह गयी चलो तब जिम में ही मिलते हैं।
असमंजस में पडा मैं कुछ तरकीब ढूंढ रहा था कि उसने कहा 'रहने दो मैं तो मजाक कर रही थी। तब तक क्लास के बाहर मेरी अच्छी खासी क्लास चल रही थी जीसका बाकी स्टुडेंट्स मजा ले रहे थे। मैं कालेज भर में रौब जमाते घूमने वाला आज सबके लिए एक बच्चा बना मुझे लगा। मैंने सीधा कालेज के बाहर का रास्ता पकड़ा और बीना कहीं रुके सीधा घर पर पहुंच गया।
उस दिन न तो खाने में मन था न और कुछ करने में। मेरी इतनी बुरी हालत पहले कभी नहीं हुई थी, बल्कि मुझसे बात करने के लिए बच्चे लोगों को सोचना पड़ता था। दिन किसी तरह गुजरा रात भी उथल-पुथल में बीती।
सुबह जब फिर से कालेज जाने का समय आया तो दिल कचोटने लगा, पर एक अंजान सी ललक मुझे कालेज के अहाते तक खींच लाई। मैं ग्रांउड तक पहुंचा और लॉन पर किसी तरह टिक गया। मेरा दिल पता नहीं कुछ सोच रहा था भी या नहीं, लेकिन मुझे अहसास किसी बात का न था। 
पता नहीं कितना समय बीता, पास में एक आहट सी महसूस हुई। मैंने नज़र उठाकर देखा तो मेरे करीब वो भी बैठी मुझे ही अनथक देख रही थी। मैं उस पर गुस्सा करूं या और क्या करूं यह सोच ही रहा था कि उसी के मुख से चंद शब्द मुझपर आ धमके। उसने कहा, देखो इतना असहज हो कर मुझे घूरने की जरूरत नहीं। मैं जानती हूं तुम्हारी मर्यादा, और मैं चाहती भी नहीं कि तुम कोई सफाई दो। दरअसल मैंने पहल की है तो मुझे ही मामला सुलझाने दो। मैं बस सुन रहा था, उसने आगे कहा, देखो इतना बड़ा कालेज है, इतने सारे स्टुडेंट्स है, मैं तुम्हारी कालेज में किस प्रकार की शोहरत है यह सब जानती हूं। उसके बाद भी तुम्हारी ओर आगे बढ़ कर आई हूं, क्या इस का कोई मतलब नहीं बनता तुम्हारी नज़र में।
इतना कहकर वो मेरी तरफ देखने लगी मेरे जवाब की चाह में। थोडा समय यूं ही सन्नाटे में निकल गया, लेकिन वो भांप गई कि मैं भूमिका बांधने में लगा हुआ हूं। बडे संयम से लेकिन निश्चित मन से वो बैठी हुई थी।
मैंने फिर पोजीशन बनाई, उसकी तरफ देखा और कहा 'देखो! मैं कालेज में एक विशिष्ट किरदार निभाता हूं जिसकी हर कालेज में जरूरत होती है, ताकि स्टुडेंट्स में एक डिसिप्लिन कायम रहे। और मैं वो भली-भांति निभाता आया हूं। तुम्हारी इस अचानक एंट्री ने मुझे झकझोर कर रख दिया है, और मैं अपना स्व नियंत्रण खो रहा हूं, कश्मकश में पड़ गया हूं कि तुम्हें क्या कहूं। 
पल भर का सन्नाटा! फिर उसने कहा देखो ऐसा नहीं की अचानक मैं तुमसे आ धमकी हूं। हम दोनों को एक अर्सा हुआ है इस कालेज में। हम दोनों एक साथ ही यहां दाखिल हुए, तुम्हें तब से चाहती हूं। जब तुम कालेज की गतिविधियों में हिस्सा लेने लगे, आगे बढ़ कर स्टुडेंट्स की आवाज बनने का प्रयास करने लगे, तब थोडा अजब सा विचार मन में आता था। क्या यह लडका वाकई पहचान बढ़ाने के लायक है? तब और भी तुम्हें जानने की मन्शा जागृत होती थी। अक्सर उस समय मन में टीस उठती थी जब कोई और लड़की की बातों में तुम्हारा जिक्र आता था। इस अवस्था से उबरने का कोई रास्ता दिख नहीं रहा था और दिल दिमाग दोनों तुम्हें साथ पाने का आग्रह कर रहे थे। तो मैंने यह तरकीब ढूंढ निकाली और तुम्हें मुझसे वार्ता करने को आकर्षित किया। लेकिन तभी ये जान गई कि पैलवान तो तुम लगते हो मगर दिल से कमजोर हो तो आज मैंने सोच लिया कि तुम्हें ज्यादा उलझन में ना रखा जाय। सो यहां चली आई हूं, अब तुम्हें उत्तर देना है कि क्या तुम मुझे चाहने लगे हो? 
न न! कोई औपचारिकता की जरूरत नहीं है, बस तुम आज के लिए हां या ना इतना कह सकते हो। मुझे जल्दी नहीं लेकिन कालेज में तुम्हारी कहानी गूंजने लगी है और उसका सीधा असर तुम्हारी छबी पर पड़ेगा यह जानकर मैं इसका निर्णय करना चाहती हूं।
करीब १५ मिनट हम दोनों निश्चल बैठे रहें। कालेज में मटरगश्ती करने वाले लड़के लड़कियां जान बूझकर इधर उधर घूमते हुए ताका झांकी में लगे हुए थे। झेंपते हुए मैंने उससे कहा 'हमें यहां से जाना चाहिए'। उसने मेरी तरफ कटाक्ष करते हुए कहा 'हां या ना'।
मैं फिर कुछ कह न पाया, उसने कहा ठीक है, तब हम यहीं पूर्ण विराम देते हैं और अब के बाद हम फिर नहीं मिलेंगे। कहकर वो निश्चय से उठी और जाने के लिए बढी थी कि मेरी जुबान से एक आर्त आवाज निकली "आय लव यू"।
उसने झटके से मेरी तरफ देखा, मैं लॉन की तरफ देख रहा था। वो फिर से मेरे पास आ बैठी, मुस्कुरा रही थी, हिम्मत जुटा कर मैंने आंख उठाकर उसे देखा। कुछ निर्णायक भाव से उसने मुझसे कहा ' हां ठीक है, अब इसी जगह हम मिलते रहेंगे मगर क्लास बंक करके नहीं। और हां, बहुत समय है हमारे पास आगे जीवन में। तो अपना करियर और ऐक्टिविटी को दरकिनार नहीं करना है। कहकर वो चली गई। मेरा शरीर मानो वज़न रहित सा कुछ देर वहीं पड़ा रहा। दूर से मुझे निहारने वाले मेरे मित्र आखिर मेरे पास आकर असमंजस में पूछने लगे 'भाई आखिर हुआ क्या, क्या वो तुमसे नाराज़ हो कर चली गई, या तुमने उसे ना कह दिया? उनकी नकारात्मक बातें सुनकर मैं तडाक से बोल पडा 'अरे नलायकों वो मुझे हथिया कर चली गई' मेरे दिल दिमाग पर उसनेे खुद का सिक्का जमा दिया है। वो मेरी हो गई है।
फिर क्या था पूरे कालेज में उस दिन बस एक ही बात चल रही थी "मैं और मेरी प्रेमिका"
किसे पता था इज़हारे मुहब्बत इतना आसान होगा। ज़मीं पर रहूंगा मैं और छोटा आसमान होगा।
कवि'रवि'

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