एहसास ए अजायब
तेरे शहर की हवा
कुछ अजीब सी है,
यहाँ हर मर्ज़ की दवा
कुछ अजीब सी है
मस्ती में झूमते यहाँ लोग
उलझे उलझे से,
सिसकियाँ लेने की अदा
कुछ अजीब सी है।
छटपटाते भी है मगर
गुमसुम गुमसुम,
इज़हार ओ इऩकार एकसाथ
खता अजीब सी है।
आगोश में समेटते हैं हर रोज़
नयी मंजिलों को,
खामोश चेहरों की सदा
अजीब सी है।
मैने भी देखा है तेरे शहर को
अनदेखा था,
मुझमें कहाँ से आयी है बता
ये बात अजीब सी है।
कवि'रवि'

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