अक्सर के जिंदगी में
अक्सर के जिंदगी में
ऐसा समां आता है
उम्र भर का जुनून
जाने कहां खो जाता है
मैं न मैं रहता वो न वो होता
ये मोजिज़ा है
मैं उसमें वो मुझमें फना होता है
न था दस्तूर
के करूं मैं उसका इस्तक़बाल
जब वो आता है
ठिकाना उसने चुना होता है
अब देर बहोत हो गई है
क्या उससे दुआ करूं
जो मुझमें है बसर
सब उसका दिया होता है
क्या मांग के लाये थे
क्या दे जा रहे 'रवि'
तारीख में लिखा जाता है वो
जो उनको पता होता है
कवि'रवि'

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