Thursday, 11 November 2021

वो चश़्मे नम

वो चश़्मे नम
हया ही नुमाया करती है
गुमां होता है, हो न हो
वो मुझपर ही मरती है
है ख्वाहिश के 
इकबार मिलाप हो जाए
नज़रों के रास्ते 
रुह रुहसे मिल जाए
वो कैसा है आलम
जो बेचैन ही रक्खें 
जुबां तक भी आए
और खामोश भी रख्खें 
कवि'रवि'

0 Comments:

Post a Comment

Subscribe to Post Comments [Atom]

<< Home