शबनम
वो 'शबनम' थी मेरी जो कांधे को प्यारी
कैसे बखानूं ........ थी कितनी दुलारी
सुबह जब निकलते थे घर से तो यारों
सजी थी क़िताबें इसके भीतर ही प्यारों
कालेज की हवाएं बड़ी शोख हरदम
संभालें न सम्हले वो कांधे की 'शबनम'
कभी फूल होता कभी खत की बारी
दिलों जां की हमदर्द 'शबनम' वो प्यारी
ये ऐसा निशां थी..... वो अहसास करते
बड़ी आसमंदी........ वो महसूस करते
हमें यूं गुमां था....... के हम हैं रहमगर
असल में तो हकदार 'शबनम' थी यारों
कभी याद करते हैं...... लम्हें वो सारे
बसी है खयालों में 'शबनम' भी प्यारे
कवि 'रवि'

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