Tuesday, 12 April 2022

ना जाने क्यों

ना जाने क्यों अक्सर ऐसा होता है
सपने तो आते हैं मगर टूट ही जाते हैं
इरादों को मंज़िल में तब्दील करते करते
इरादें ही यकायक बदल जातें हैं
वो मंज़र जो ऐतमाद को पुरसुकून बनाते हैं
वक्त की मार से कैसे फनां हो जाते हैं
अपनी आवारगी का क्यों करें गिला कोई
और भी कई सुलझे इन्सान बदल जाते हैं
'रवि' एक अदनीसी अबादत है तेरी
बडे नामचीन भी यहां गुमशुदा हो जाते हैं
कवि'रवि'

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