चार शेर
मेरी ख़ामोशी मेरे जज़्बातों का किरदार हैं
बदजु़बानी से ज्यादा बेजु़बानी असरदार हैं
कलम मेरी गुमां होता है शमशीर की धार है
एक एक लफ्ज़ जो लिखा मुनाफिकों पे वार है
वतन की राह पर निछावर सारा कारोबार है
नज़र की ताब में आया, उसका जीना दुश्वार है
हम फना होंगे यकीनन फिर भी दर्दे दिले यार है
याद आएंगे जब शहीद हम भी उनमें शुमार है
कवि'रवि'

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