काश के ऐसा होता
इल्तेजा
उनके आंसू न सही, नज़र की बेचैनी तो देखो
लुटे लुटाये से बेरंग, बदहवास जिस्म तो देखो
क्यों आस बांधे हुए हैं, जरा जानकर तो देखो
अपनों को रौंद कर आये हैं, वो चरण तो देखो
तुम मखमल में लबालब, नंगे हालात तो देखो
कुछ न समझें हो गर, खुद को उनमें तो देखो
जली है बस्तियां, महलों से झांककर तो देखो
दबी हुई उन सांसों को, आजमा कर तो देखो
अंजाम
माना वे बेगैरत है 'रवि', पुकार कर तो देखो
न सुलझेगा मसला, तीर चला कर तो देखो
बेइंतेहा ही सही,जज़्बातों को जगाकर तो देखो
नाकाम हो तरकीब, उनकी हस्ती मिटाकर तो देखो
कवि'रवि'

0 Comments:
Post a Comment
Subscribe to Post Comments [Atom]
<< Home