वक्त के सितम
इन्सानीं मन्शाओं को रौंदकर
हर दिन हर पल... वक्त तारतार कर देता है
मेरी तुम्हारी और हम सबकी... वो चाहत
जिसे ख्वाब में सजाकर हम सुबह तराशते है
भरी दोपहर के आफताब को झेलते हैं
अधनंगी कभी तो कभी सुरक्षित पीठ पर
जाने कहां कहां हुआ करती हैं हमारी मंजिलें
वक्त का अजूबा है कि खोई खोई ही रहती है
है कोई साधू या के कोई शैतान
वक्त के साथ ही उसकी जहद होती है
है वक्त मेहरबान तो गधा भी पहलवान
वरना हुनरमंद को भी फांके हुआ करते हैं
'रवि' एक आस लिए जीता है यहां हर शख्स
के अपना भी वक्त आयेगा, दिल में दुआ होती है
कवि'रवि'

0 Comments:
Post a Comment
Subscribe to Post Comments [Atom]
<< Home