दरस की प्यास
दरस की प्यास अनबुझी कैसी
तेरे नजदीक हूं फिर ये दूरी कैसी
मेरी हर सांस है तेरी ही कायल
तुझे ना देखूं तो ये बेसब्री कैसी
दो निवालों का जतन नामुमकिन
तेरे रहमों करम पे ये नाशुक्री कैसी
सफ़र की इंतेहा जब उसके चरण है 'रवि'
आया है पैगाम तो ये सरसरी कैसी
यूं तो कोई बात अब ललचाती नहीं
दरस देने वो तैयार तो ये इनकारी कैसी
कवि'रवि'

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