Monday, 9 May 2022

जुल्फें नागवार

आपके चेहरे पे आदतन
थिरकती रहती है जुल्फें
स्याह होकर भी दिवाना
करती रहती हैं वो जुल्फें
अठखेलियां उंगलियों से
पेश करती हैं नज़ारा
आंखें कितनी बदगुमां है
देखती रहती हैं जुल्फें
बाद अब के हो गयी शब 
धड़कनों को दिल गुज़ारा
ख्वाब पर होकर सवार
क्यों रुबरु होती हैं जुल्फें
चल 'रवि' दिन यूं ही गुजरा
वस्ल की दुनिया बहारा
आरजू इश्के तमन्ना
नींदें चुरा ले गयी है जुल्फें
कवि'रवि'

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