जुल्फें नागवार
आपके चेहरे पे आदतन
थिरकती रहती है जुल्फें
स्याह होकर भी दिवाना
करती रहती हैं वो जुल्फें
अठखेलियां उंगलियों से
पेश करती हैं नज़ारा
आंखें कितनी बदगुमां है
देखती रहती हैं जुल्फें
बाद अब के हो गयी शब
धड़कनों को दिल गुज़ारा
ख्वाब पर होकर सवार
क्यों रुबरु होती हैं जुल्फें
चल 'रवि' दिन यूं ही गुजरा
वस्ल की दुनिया बहारा
आरजू इश्के तमन्ना
नींदें चुरा ले गयी है जुल्फें
कवि'रवि'

0 Comments:
Post a Comment
Subscribe to Post Comments [Atom]
<< Home