Monday, 2 May 2022

अक्षय्य तृतीया

मानवी विकास का मूलमंत्र है बुद्धि और इस बुद्धि का विकास यह एक अविरल तथा प्राकृतिक क्रिया ही है। आज और कदाचित मानवी अस्तित्व के अंतिम क्षण तक बुद्धि का यह प्रवाह नहीं थमेगा।
आप सोच रहे होंगे कि अक्षय्य तृतीया के साथ इस बात का क्या औचित्य है, तो उसे मैं नीचे विशद करने की चेष्टा कर रहा हूं। 
मानव का विकास जिस प्रक्रिया के तहत होता आया है उस का मूलाधार है 'संस्कार'! संस्कारों की कड़ियां जोड़ जोड़कर संस्कृति का प्रारूप बना और संस्कृति के आधार से मनुष्य समाज तथा समूहों को अपना कर जीने लगा। 
मनुष्य का जीवन जैसे जैसे सुकर होने लगा तैसे तैसे उसे अपने पूर्वजों ने रच रखी सुविधाएं उपककारक लगने लगी और फलत: उनके ऋण का परिमार्जन करने की भावना उसके मन में जागृत होने लगी। समाज में एकसूत्रता की आवश्यकता ने समाज को मुखिया दिया और उस मुखिया को समाज हित में कुछ आयाम स्थापित करने को अनुबंधित किया गया। ऐसे मुखियाओं के समान विचारधारा ने तीज त्यौहार स्थापित किए जिनमें अधिभौतिक शक्तियों के उपकारों के साथ पूर्वजों के उपकारों को भी स्मरण करने के आयाम दिए गए।
अक्षय्य तृतीया भी एक ऐसा ही व्रत या विकल्प जो भी कहिए है जिस दिन पूर्ण दिवस को पवित्र माना गया है और अपने पूर्वजों को प्रसन्न करने हेतु यथासंभव प्रयास करने का प्रबंधन कराया गया है। 
अक्षय्य तृतीया का अवसर भी तभी सुनिश्चित किया गया जब सृष्टि अपने चरमोत्कर्ष पर पहुंची होती है, समाज जीवन सुबत्ता से भरा रहता है और हर्षोल्लास से हम त्यौहार मनाने को लालायित रहते हैं। 
आइये इस बार भी हम अपने पूर्वजों को स्मरण करते हुए उन्हें सदा सर्वदा हमें खुश देखने का अवसर प्रदान करें।
अक्षय्य तृतीया की आप सभी को बधाई।
कवि'रवि'

0 Comments:

Post a Comment

Subscribe to Post Comments [Atom]

<< Home