Friday, 29 April 2022

छंदमुक्त

हां ये ब्रह्माण्ड भी है एक छंद का गुलाम
इन्कलाबी विचारों से जागृत होता है कभी कभी
पर छंदबद्धता के आगोश को नहीं भेद पाता
समय कहिए या काल, कराल है उसकी करनी
या कहिए कि काल भी है छंद के क़फ़स में बद्ध
सृष्टि और सौगात अपनी नेमत की कायल
बहु आयामी मानव भी जीवन चक्र में छंदबद्ध
लेकिन एक बात अवश्य है 'रवि' जो सबके परे
छंदमुक्त हो कर निकल जाती है आत्मा बन कर
कवि'रवि'

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