Friday, 29 April 2022

स्याह रातों का सफ़र

स्याह रातों का सफ़र
मैं मंजिल से बेखबर
चरमराते है पत्ते
बेगुमान कदमों तले रौंदकर
तन्हाई की गूंज
दिमाग को झंझोडती हुई
न साथ करने को खयाल ही है
न अरमां न हीं हमसफ़र
पत्थर से लगी चोट 
एक आह निकाल लाती है
एहसास जाग जाता है
एक अनबुझी अबादत का
क्यों न खोजूं मैं कभी
सहारा किसी साहिल का
कुदरत तेरे अहले करम
मैं मुस्तफा मेरे दिल का
कवि'रवि'

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