कैसे बयां करें
कैसे बयां करें वो दास्तां अपनी ज़ुबानी
अल्फाज़ लापता है, कैसे कहें अपनी कहानी
अश्कों इश्क़ का, कुछ ऐसा है रिश्ता
जो भी उलझता है, कर बैठता है नादानी
क्या मुहब्बत की आग, धधकती है जेहन में
या के फिर, उसका सरोकार है रूहानी
दिल नादान होता है, उसपे अपना जोर नहीं मुहब्बत एक रोग ऐसा, बाखुदा आसमानी
इश्क पर नाकाम है 'रवि', कैसे गिला करें
जुबां फिर भी गुनाह करती है, ये कैसी नादानी
कवि'रवि'

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