अंजामे बेवफाई
तड़प का अंजाम एक आह में तब्दील होता है
नजरों से अक्सर अश्कों का सैलाब निकल आता है
दिल चाहे न चाहे चेहरे पे सिकुड़न
और लबों पे अंगार निकल आता है
क्या फितरत का कसूर क्या हालात बे काबू
कुदरती बेगैरत पे गुस्सा बेशुमार निकल आता है
अपना वजूद किस तरह सहेज पाओगे 'रवि'
गाहे बगाहे किस्सा ए शर्मसार निकल आता है
कवि'रवि'

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