करना तो बहुत कुछ है
करना तो बहुत कुछ है मगर
सुयोग्य समय की कमी है
हसरतों का बोझ निरंतर
निज सफलता की कमी है
रोज है आघात मन पर
सुखदाई क्षण की कमी है
दुर्दांत होता दिन धरा पर
प्रभामय निशांत की कमी है
एक वो और एक मैं पटल पर
दृष्टि में सहजता की कमी है
चक्षु है नित शोध तत्पर
आत्मसंज्ञान की कमी है
क्या करें के तू हो गोचर
तू ही बता अब क्या कमी है
तेरी धरा तेरा ही अंबर
तू बोल क्या तुझमें कमी है
कवि'रवि'

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