मदहोशी ऐसी
मदहोश है ज़माना कुछ इस कदर आजकल
न कारगर है शक्लो सूरत न कामयाब अक्ल
जीने का सलीका लम्हों तक की हद में कैद
कोई कहता है कुछ तो आह आती है निकल
दिल की शिकायतें एक भरम सी बनी है
ना दलीलें देने की फुर्सत, ना कोई वक्त मुकम्मल
ये मंज़र कैसा है 'रवि' के चोटिल है आसमां
वो वादें वो फसाने सब बेतुका कहने के काबिल
कवि'रवि'

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