एक पेशकश
वो आते हैं रोज़ दरीचे पे
कहते हैं इश्के तौबा
नज़र फेर कर निकल जाते हुए
हमें घायल छोड जातें हैं
आशनाई से निजात पाकर
जब पलटते हैं हम दिन दुनिया की तरफ
उनके अब्बाजान जेहन की
सिलाई उधेड़ जाते हैं
हाय रे किस्मत और तेरा जलवा
हम तेल लगा लगाकर
पिटने के लिए
रोज़ चले आते हैं
इश्क नासूर
न जिलाता है न मरने देता है
मज़हार की दहलीज से एक पल
उधार मांग आते हैं
तू मुहब्बत न कर सकीं
ना सही
ये दिलो ईमान तेरे सदके में
रख कर चले जाते हैं
कवि 'रवि'

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