Friday, 23 December 2022

गज़ल

अब क्या शिकायत करें के दिल तो लगाए बैठे हैं।
तेरे आने की फ़िक्र में नजरों को जमाए बैठे हैं।
ना कोई ख्वाब ना हकीक़त की जुगत काम आती है।
तेरे दीदार आखरी बार हों यह आस लगाए बैठे हैं।
ना जाने ये दर्दे इश्क़ इतना बे मुरव्वत क्यों है।
ठुकराए गये सौ बार फिर भी तकरार लगाए बैठे हैं।
दिल आशना होना था हो गया 'रवि'
अब किस बात पर शर्मसार हुए बैठे हैं।

कवि 'रवि' 

मिसाल

ये क्या मिसाल है के बदस्तूर वो पेश आते हैं
जज्बों के तूफान की मानिंद बेशतर पेश आते हैं
आबोहवा इस शहर की मर्ज दे रही है हमें
ना दवा ना इलाज वो अहले खंजर पेश आते हैं
यूं आशना हुए के दिलो जान लुटा बैठे
गुमाॅं होता है वो लुटेरे बेहतर पेश आते हैं
फिज़ा की फितरत क्यों कर भा गई है हमें
जिनपे गुलिस्तां लुटाए वे नश़्तर पेश आते हैं 
तुम वो साहिल हो 'रवि' जिसका दर्या भी गाफिल है
दुआएं भी न दे पाएं इतने कमतर वो पेश आते हैं
कवि 'रवि'


गज़ल

दिल बागबां है के जश्ने बहार है
गुलों पर इक अनदेखा खुमाॅंर है
मदहोश हो गया हूं मैं खुशबू ए शफ़क़ से
गुमां होता है कि मेरे दरमियां गुबार है 

वो शबनमी चमक वो करिश्माई पौधे
अचानक कहीं से वो तितली भी कौंधे
ये दिल है नादां के सम्हलता नहीं
के बगिया का मानों ये जैसा भंवर है

लचकती घास की वो बेहतरीन अदाएं
मचलते नक्श़  पे थिरकती निगाहें 
आबोहवा ने यूं भर दी है झोली
दिले बागबां की उसको ख़बर है 

कवि 'रवि'