Thursday, 31 August 2023

इक छोटा-सा दिल और मैं हूं


इक छोटा-सा दिल और मैं हूं 
एक नया-सा डर और मैं हूं 

दश्त की लंबी रात है तन्हा 
सफ़र नया 'अंजान' और मैं हूं

किसे कहें हमराज़ यहां पर
बिगड़े हुए जज़्बात और मैं हूं

इक तूफां हमराह बना है
टूटी हुई पतवार और मैं हूं

सुलझेगा कैसा यह मंज़र
उलझन की भरमार और मैं हूं

कवि 'रवि'


Friday, 11 August 2023

गंदी आंधी

लूटी मेरी आज़ादी बिना खड्ग बिना ढाल
गोबरमती महंत तुने कर दिया बवाल
गंदी तेरी नीयत गंदी तेरी हर चाल
गोबरमती महंत तुने कर दिया बवाल

अपनों से लड़ी तूने अजब ढंग लडाई
काटे है गले सबके ना तलवार चलाई 
दुष्मन के लिए की है तूने अपनों पे चढाई 
रहके भी महलों में सदा फकीरी ही दिखाई
चुटकी में बोस को दिया इस देश से निकाल
गोबरमती महंत तुने कर दिया बवाल
लूटी मेरी आज़ादी बिना खड्ग बिना ढाल
गोबरमती महंत तुने कर दिया बवाल 

सतरंजी बिछाकर जहां बैठा था हर कोई
मुश्किल थी जो राह शत्रु को आसान कराई
ताकत न थी दुष्मन में कभी हम को हराना
पर तूने सभी के विश्वास को न माना
मारी धोबी पछाड़ ऐसी के सारे हुए बेहाल
गोबरमती महंत तुने कर दिया बवाल
लूटी मेरी आज़ादी बिना खड्ग बिना ढाल
गोबरमती महंत तुने कर दिया बवाल

जो खाया हमनें झटका आज तलक न सुधरे
तेरी अक्ल का असर है हम जातियों में बिखरे
एक थे सब गांव शहर धर्म एक था
मानवता के साथ में मानवता से ही गुज़रे
तूने जहां छल करते हुए भजन सुनाए
नाचीज़ को बवंडर के मैदान दिखाए
धीरे धीरे अब समझ रहे लोग तेरी चाल
गोबरमती महन्त तुने कर दिया बवाल
लूटी मेरी आज़ादी बिना खड्ग बिना ढाल
गोबरमती महन्त तुने कर दिया बवाल