भरम और हकीकत
किसकी तारीख़ को याद कर
करता है दुआ रे
ख़ाक में धस चुकी है
शहंशाहों की मज्हारें
ये भरम तेरा तुझे
कोई ना छुएगा
गर्त में मिलाएगा तुझे
बस इतनी खता रे
दुष्मन तू जिन्हें जानके
चाहता है इन्तेक़ाम
हमराजो हमदर्द
तेरे ही तो थे प्यारे
लोगों को सिढी जानकर
जो उछला था तू कभी
गिरना तेरी फितरत थी
तो फिर कैसा रोना रे
कवि 'रवि'

0 Comments:
Post a Comment
Subscribe to Post Comments [Atom]
<< Home