हुस्नो शबाब
चांदनी रात और तुम्हारा शबाब
जैसे आसमां में दो दो माहताब
नूरे चश्म की चकाचौंध भुला रही है
मजबूर मेरा ज़मीर दगा दे रहा है
रातों का सफ़र तन्हा था कभी
तेरा रश्के-मह शरीके इश्रत कर रहा है
न था आगाज़ तो अंजाम भी न था
आलमे मोहब्बत तकरार कर रहा है
उल्फत के अफसाने है तारीख में शामिल
'रवि' तेरे नाम का जिक्र अब आम हो रहा है
कवि 'रवि'

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