Tuesday, 10 September 2024

हुस्नो शबाब

चांदनी रात और तुम्हारा शबाब 
जैसे आसमां में दो दो माहताब 
नूरे चश्म की चकाचौंध भुला रही है 
मजबूर मेरा ज़मीर दगा दे रहा है 

रातों का सफ़र तन्हा था कभी 
तेरा रश्के-मह शरीके इश्रत कर रहा है 

न था आगाज़ तो अंजाम भी न था 
आलमे मोहब्बत तकरार कर रहा है 

उल्फत के अफसाने है तारीख में शामिल 
'रवि' तेरे नाम का जिक्र अब आम हो रहा है 
कवि 'रवि'

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