रूहे रवां
जो कल साथ था
फ़ना हो गया है
आबाद गुलशन
कजां बन गया है
दस्तूर ए कुदरत
बडा बेरहम है
महफिल थी जो कल
बियाबां बना है
ना कभी पूछता था
तवज्जो नहीं दी
वो फिर क्यों जिगर में
बसर कर गया है
'रवि' राहबर तू
किसी का नहीं था
तेरा ज़िक्र फिर वो
क्यों कर गया है
कवि 'रवि'

0 Comments:
Post a Comment
Subscribe to Post Comments [Atom]
<< Home