उम्र का तकाजा और मैं
उम्र के तकाजे ने 'रवि'
जिस्म को अधमरा कर दिया
मन बन उड़ता पंछी मगर
जाने कहां कहां चल दिया
वो वो न रहे हम हम ना रहे
वक्त के धुंधलके ने
नामोनिशान बदल दिया
एक आह भी उनकी तभी
आफते जां हुआ करती थी
आबोहवा ने इस दौर के
सारा जहां बदल दिया
क्या ख़ाक में अब चैन से
जीना सलीकेदार होगा
कब्रगाहों को किसी ने
शोरगुल से भर दिया
रस्मों रिवाजों को निभाने
वक्त ही बाकी नहीं
मय्यते इंसां को कंधा
चार पहियों ने दिया
चार लम्हे इशरतों के
क्यों भुलाये ना भुले
याददारी ने क्यों मुझे
इतना निकम्मा कर दिया
कवि 'रवि'

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