Friday, 17 January 2025

जिंदगी जीने का फलसफा

जिंदगी जीने का फलसफा मेरा 
तुम क्या जानो 
कैसा दिखता हूं, हर सुबह 
आइने से पूछ लेता हूं 
आंख मूंद कर हर रात 
सोने से पहले 
कैसे पेश आया हूं दिन भर 
अंतर्मन से पूछ लेता हूं 
रात कैसे बीती 
मेरे बिस्तर की सिलवटें 
उठते ही समझा देती है 
ख्वाबों में ख्याल या फिर ख्याली ख्वाब 
जो भी पेशतर होता है 
उसे वक्त का बर्ताव मान लेता हूं 
'रवि' इस अलम दुनिया में 
एक तू ही है अलाहिदा किरदार 
बीतने वाले हर पल को 
अपना कलमगार जान लेता हूं 
कवि 'रवि'

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