Friday, 28 February 2025

दिवालिया ऐ दिल

दिल से दिवालिया हो गये है 
कमाल के कमालिया हो गये है 
इश्के नासमझ की हद कोई क्या जाने 
हर हाल से बेहालिया हो गये है 
एक दिल के सहारे जी लिए थे अब तक 
लुटाकर उसे कंगालिया हो गये है 
किस्मत की लकीरें क्यों खरोंच दी 
बे किस्मत फकिरीया हो गये है 
ये अधूरी जिन्दगी क्यों बक्षी तूने मुझे 
इस सवाल से सवालिया हो गये है 
ये आबोहवा ये जहां की नेमतें तेरे लिए 
जस की तस अदा कर हवालिया हो गये है 
कवि 'रवि' 

Sunday, 16 February 2025

दसों दिशाएं और सकल ब्रह्माण्ड

दसों दिशाएं और सकल ब्रह्माण्ड 
संस्कृति पूर्ण मेरा भारत खंड 
धरा पे बहती पवित्र नदियां 
स्वास्थ्य देती दुर्लभ संजीवनियां 
भोर सवेरे उगता नारायण 
पूर्ण करें हम सब का जीवन 
पर्वत शिखर जलकुंभ अरण्य 
पवन प्रकृति और 'वर्षा'सन 
योग प्रयोग का नित्य अनुष्ठान 
शास्त्रों का अद्भुत प्रतिष्ठान 
दुनिया भर में ज्ञानावर्तन 
संपन्न करें जगत जन जीवन 
मैं और मेरा चरित्र-तन-मन 
क्षण क्षण हे मां तुझको अर्पण 
भारत माता की जय 
वंदे मातरम् 
कवि 'रवि'