Friday, 28 February 2025

दिवालिया ऐ दिल

दिल से दिवालिया हो गये है 
कमाल के कमालिया हो गये है 
इश्के नासमझ की हद कोई क्या जाने 
हर हाल से बेहालिया हो गये है 
एक दिल के सहारे जी लिए थे अब तक 
लुटाकर उसे कंगालिया हो गये है 
किस्मत की लकीरें क्यों खरोंच दी 
बे किस्मत फकिरीया हो गये है 
ये अधूरी जिन्दगी क्यों बक्षी तूने मुझे 
इस सवाल से सवालिया हो गये है 
ये आबोहवा ये जहां की नेमतें तेरे लिए 
जस की तस अदा कर हवालिया हो गये है 
कवि 'रवि' 

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