Monday, 20 January 2025

हृदय समंदर बन मेरा

हृदय समंदर बन मेरा 
हर ग़म को समाये बैठा है 
बस्ती बस्ती सहरां सहरां 
खुद को लुटाये बैठा है 
इक आवाज़ की जिद है 
कि वो बाहर आएगी 
सब्र भरा पर दिल ये मेरा 
उसको दबाए बैठा है 
लहर लहर पर उसकी रौनक 
पल भर ही तो होती है 
हुजूम लेकिन उसी झाग को 
अपना दिल दे बैठा है 
चश्मे नम की दो बूंदें 
सागर को नमकीन कर देती है 
वक्ती तपिश से सारा जंगल 
देखो झुलसा बैठा है
एक अकेला मैं और 
मेरी रंजिश की वो यादें हैं 
नहीं मिटने वाली है फिर भी 
जबरन झुठला बैठा है 
'रवि' कभी तो उम्मीदों को 
ज़रा मुकर्रर होने दे 
जिन्हें भुलाना चाहा जब तब 
उनसे लिपट कर बैठा है 
कवि 'रवि' 

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