हृदय समंदर बन मेरा
हृदय समंदर बन मेरा
हर ग़म को समाये बैठा है
बस्ती बस्ती सहरां सहरां
खुद को लुटाये बैठा है
इक आवाज़ की जिद है
कि वो बाहर आएगी
सब्र भरा पर दिल ये मेरा
उसको दबाए बैठा है
लहर लहर पर उसकी रौनक
पल भर ही तो होती है
हुजूम लेकिन उसी झाग को
अपना दिल दे बैठा है
चश्मे नम की दो बूंदें
सागर को नमकीन कर देती है
वक्ती तपिश से सारा जंगल
देखो झुलसा बैठा है
एक अकेला मैं और
मेरी रंजिश की वो यादें हैं
नहीं मिटने वाली है फिर भी
जबरन झुठला बैठा है
'रवि' कभी तो उम्मीदों को
ज़रा मुकर्रर होने दे
जिन्हें भुलाना चाहा जब तब
उनसे लिपट कर बैठा है
कवि 'रवि'

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