Saturday, 25 October 2025

दुनियादारी

दुनियादारी

क्या गज़ब है, कि दुनियादारी बाज नहीं आती

लाख मुकाम हासिल किए ,पर औकात नहीं बनती

 

कुछ 'संग' ऐसे, जो बिठाए गए सर आंखों पर

कुछ कुचलते हैं दम ब दम, पर पहचान नहीं बनती

 

एक मंज़र, जश्ने आम की मेजबानी में मशगूल

दरे महफ़िल पे, वाईज की अहमियत नहीं बनती

 

बदस्तूर उसकी हर हरकत, लाज़मी थी लेकिन

शतरंज के प्यादों से उलझ कर, बिसात नहीं बनती

 

किस्म किस्म के नुस्खे, परोसें भी हो चाहें जिधर

फटी झोली हो 'रवि', तो इमदाद नहीं बनती

 

कवि 'रवि'

 

 

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