एक सवाल
नज़र के आगे धुआं-धुआं सा क्योंकर है
आबे चश्म रुक्सार पे रुका-रुका सा क्योंकर है
जिंदादिल वो था फिर ये क्या हुआ
हर लफ्ज़ लबों पे थरथराया सा क्योंकर है
रुबाई के आगोश में गुजरी है रात सारी
गज़ल का उनवान यूं डरा-डरा सा क्योंकर है
हर शख्स की अपनी कहानी है अगर
ज़माना बदलेगा ये कहकर वो मरा-मरा सा क्योंकर है
गर चे दिलो दिमाग पर रहता न अमल कोई
ख्वाहिशें लेकर वो दबा-दबा सा क्योंकर है
मैं न हूं तो ज़माना भी नहीं होगा
ये सोचकर वो हारा-हारा सा क्योंकर है
है ख़ाक ही हकीकत 'रवि' अफसोस कैसा
मिटने के बाद भी तू बाकी जरा-जरा सा क्योंकर है
कवि'रवि'

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