वाकया और वास्तव
राह चलते उस मकाम पर
उस भिखारिन ने असमंजस में ही लेकिन
मुझसे पूछा " बाबा कुछ मिलेगा"!?
उसे चौंकाते हुए मैंने पर्स निकाला
और दस रुपए थमा दिए
अचरज से उसकी आंखें चमक उठी
वो पूछ बैठी सब के सब!?
मैंने एक नज़र उधर देखा
मेरा मन मुझसे ही पूछ बैठा
क्या ये तेरी औकात को पहचानती है
मैं कुछ कहूं इससे पहले
वो मेरे पांव पर झुकी
मैं शर्मिंदा! कुछ कह भी न पाया
क्या बताऊं उसे कि हां ये मेरे हक के है
जो मैंने तुम्हें दिये
मेरी भी पाकीट मनी होती है
जो मेरे बच्चे मुझे देते हैं
शायद बहुत भूखी थी छूटते ही
रेहड़ी पर कुछ खाने चली गई
मैं सोचता रहा उसमें और मुझमें क्या फर्क है
बस इतना की वो दान कमाती है
और मुझे दान दिया जाता है
वो उसके कमाई की मालकिन है
और मैं खर्च का हिसाब लिखता रहता हूं
के ना जाने कल किसी वक्त
मुझे दान करने वाले जवाब मांग लें
और मैं बता न सकूं ...और मैं बता न सकूं
कवि'रवि'

0 Comments:
Post a Comment
Subscribe to Post Comments [Atom]
<< Home