Tuesday, 11 January 2022

मकर संक्रांति बौद्धिक

जय श्री राम
श्रीराम प्रभात शाखा के आज के इस मकर संक्रांति पर्व के उपलक्ष्य में आयोजित ऑनलाइन कार्यक्रम में बौद्धिक का दायित्व मुझे सौंपा गया है। सभी स्वयंसेवकों को मैं बताना चाहता हूं कि मेरा यह पहला ही अवसर और प्रयास है कि मैं संघ के किसी कार्यक्रम में बौद्धिक ले सकूं। आशा है आप तृटियों के साथ इसे स्वीकार करेंगे।
सनातन भारतीय संस्कृति की परम्पराओं का विशेष यह है कि इनकी बहुतांश विधी निसर्ग के आयामों के साथ निगडित है। पौष मास में आनेवाला मकर संक्रांति का पर्व भी ज्ञान विज्ञान के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है और संपूर्ण आर्यावर्त में भरतखण्ड में इसकी महत्ता अबाधित है। समूचे भारत में मनाया जाने वाला यह पर्व दस विभिन्न नामों से प्रचलित है। दक्षिण में इसे ताई पोंगल और उझवर तिरुनल, पंजाब में लोहड़ी,तथा पूर्वोत्तर राज्यों में बिहू कहा जाता है। गुजरात में इस त्यौहार को उत्तरायण तो उत्तर प्रदेश तथा बिहार में खिचड़ी के नाम से जाना जाता है। इस पर्व को पश्चिम बंगाल में पौष संक्रांति के नाम से पहचाना जाता है।मान्यता है कि मकर संक्रान्ति के दिन ही गंगा जी भगीरथ के पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होकर सागर में जा मिली थीं। उसी के प्रतीक स्वरूप यहां हर साल गंगासागर में स्नान-दान के लिये वर्ष में केवल एक दिन मकर संक्रान्ति पर लोगों की अपार भीड़ जुटती है। इसीलिए कहते हैं "सारे तीरथ बार बार, गंगा सागर एक बार।"
महाराष्ट्र में इस दिन को मकर संक्रांति ही कहा जाता है। इस दिन वे सभी विवाहित महिलायें जिनके विवाह के बाद ये पर्व पहली बार होता है कपास, तेल व नमक आदि चीजें दूसरी सुहागिन महिलाओं को दान करती हैं। इस दिन तिल गूल के हलवे को बांटने की प्रथा भी है। मिट्टी के कुंभ दान का भी प्रचलन है। एक दूसरे को तिल गुड़ देते हुए बोलते हैं "तिळ गूळ घ्या आणि गोड़ गोड़ बोला" अर्थात तिल गुड़ लो और मीठा मीठा बोलो । इसके अलावा  छत्तीसगढ़, गोआ, ओड़ीसा, हरियाणा, बिहार के कुछ भाग, झारखण्ड, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक के कुछ भाग, केरल, मध्य प्रदेश,  मणिपुर, राजस्थान, सिक्किम, उत्तर प्रदेश के कुछ भाग, उत्तराखण्ड, पश्चिम बंगाल, और जम्मू में भी इसे मकर संक्रांति के नाम से ही मनाते हैं।उत्तर प्रदेश में यह मुख्य रूप से 'दान का पर्व' है। इस अवसर पर इलाहाबाद में संगम पर एक माह तक चलने वाले माघ मेले की भी शुरूआत हो जाती है। 14 जनवरी से ही इलाहाबाद में हर साल माघ मेले की शुरुआत होती है। एेसी भी मान्यता है कि 14 जनवरी यानी मकर संक्रान्ति से पृथ्वी पर अच्छे दिनों की शुरुआत होती है। इस अवसर पर गंगा सहित कर्इ पवित्र नदियों के तट पर मेले लगते है। समूचे उत्तर प्रदेश में इस व्रत को खिचड़ी के नाम से जाना जाता है तथा इस दिन खिचड़ी खाने आैर दान देने का अत्यधिक महत्व होता है। इसके साथ ही बिहार में भी मकर संक्रान्ति को खिचड़ी नाम से जाना जाता हैं। इस दिन उड़द, चावल, तिल, चिवड़ा, गौ, स्वर्ण, ऊनी वस्त्र, कम्बल आदि दान करने का महत्व होता है।खास बात ये है कि मकर संक्राति के विभिन्न नाम राज्यों के हिसाब से बंटा है।  मकर संक्रांति ये नाम छत्तीसगढ़, गोआ, ओडिशा, हरियाणा, बिहार, झारखण्ड, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक, केरल, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, मणिपुर, राजस्थान, सिक्किम, उत्तर प्रदेश, उत्तराखण्ड, पश्चिम बंगाल, और जम्मू में चलन में है।  वहीं पंजाब में इसे लोहड़ी नाम से एक दिन पहले 13 तारीख को ही मना लिया जाता है। 
तमिलनाडु में पोंगल के रूप में मकर संक्रांति चार दिन तक मनाते हैं। पहले दिन भोगी-पोंगल, दूसरे दिन सूर्य-पोंगल, तीसरे दिन मट्टू-पोंगल या केनू-पोंगल आखीर में चौथे आैर अन्तिम दिन कन्या-पोंगल। इसमें पहले दिन कूड़ा इकठ्ठा कर जलाया जाता है, दूसरे दिन लक्ष्मी जी की पूजा की जाती है और तीसरे दिन पशु धन की पूजा की जाती है। इस के बाद चौथे दिन स्नान करके खुले आंगन में मिट्टी के बर्तन में खीर बनायी जाती है, जिसे पोंगल कहते हैं। इसका सूर्य देव को भोग लगाया जाता है, जिसे प्रसाद के रूप में सभी ग्रहण करते हैं। इस दिन बेटी और जमाई राजा को विशेष रूप से न्यौता दिया जाता है, इसीलिए ये दिन कन्या पोंगल कहलाता है। तमिलनाडु में कुछ स्थानों पर इसे उझवर तिरुनल भी कहते हैं। 
भारत के पूर्वोत्तर राज्य असम में मकर संक्रान्ति को माघ बिहू या भोगाली बिहू के नाम से मनाया जाता है। इस समय असम में तिल, चावल, नारियल और गन्ने की फसल होती है। इसी की खुशी में इन चीजों से बने व्यंजन और पकवान बनाकर खाये और खिलाये जाते हैं। भोगाली बिहू पर होलिका भी जलाई जाती है और तिल व नारियल से बनाए व्यंजन अग्नि देवता को समर्पित किए जाते हैं। इस मौके पर टेकेली भोंगा नामक खेल खेला जाता है साथ ही भैंसों की लड़ाई भी होती है।
गुजरात में इस पर्व को उत्तरायण नाम से मनाया जाता है। नई फसल और ऋतु के स्वागत का ये त्योहार 14 और 15 जनवरी को मनाया जाता है। इस मौके पर गुजरात में पतंग उड़ाने की परंपरा है। इस दिन उत्तरायण का व्रत भी रखा जाता है और तिल व मूंगफली दाने की चक्की बनाई जाती है।
मकर संक्रांति को एक अन्य नाम मकर संक्रमण से भी बुलाते हैं। ये नाम कर्नाटक में प्रचलित है। हांलाकि बाकी सभी परंपरायें सामान्य रूप से वही हैं।
हांलाकि जम्मू में अधिकांश लोग इस पर्व को मकर संक्रांति के नाम से ही मनाते हैं परंतु कश्मीर घाटी के अनेक स्थानों पर इसे शिशुर सेंक्रात नाम से भी जाना जाता है। इसी तरह हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, आैर पंजाब के कुछ हिस्सों में इस पर्व को माघी भी कहा जाता है।
आइये जानते हैं मकर संक्रांति का वैज्ञानिक महत्व:
मकर संक्रांति के दिनों में नदियों में बाष्पन क्रिया होती है, इसमें तमाम तरह के रोग निवारण हो सकते हैं। इसलिए नदी में स्नान तथा सूर्य को अर्घ्य दान करने का इन दिनों में विशेष महत्व है। संक्रांति के समय में ठंड का मौसम रहता है, इन दिनों तिल और गुड़ का सेवन शरीर को ऊर्जा तथा त्वचा को स्निग्धा प्रदान करने में लाभकारी है यह विज्ञान में सुनिश्चित हुआ है। इस दिन खिचड़ी खाने को भी वैज्ञानिक आधार है, खिचड़ी पाचन को दुरुस्त रखती है। अदरक और मटर मिलाकर बनाई गई खिचड़ी रोग प्रतिकारकता बढाती है। जिससे विभिन्न जीव-जंतुओं से मुक्त रहा जा सकता है। शास्त्रों के अनुसार प्रकाशमय वातावरण में शरीर त्याग करने पर मनुष्य पुनः जन्म नहीं लेता है, जबकि अंधकार में मृत्यु को प्राप्त करने पर पुनर्जन्म लेता है। ज्ञात रहे कि प्रकाश एवं अंधकार यह दोनों उत्तरायण और दक्षिणायन के प्रतिरूप है। सूर्य के उत्तरायण के प्रतिक्षा में ही महा तपस्वी भीष्म ने अपने प्राण तब तक नहीं छोडे जब-तक मकर संक्रांति का पुण्यकाल प्रारंभ नहीं हुआ। सूर्य के उत्तरायण का महत्व छांदोग्य उपनिषद् में भी विदित है।
पुराणों में तथा विज्ञान दोनों में सूर्य के उत्तरायण का महत्व उद्धरित किया गया है। सूर्य के उत्तरायण होने पर दिन का समय बडा होता है, मनुष्य की कार्यशक्ति बढी हुई होती है, परिणामत: मनुष्य प्रगति की ओर अग्रसर होता है। प्रकाश में वृद्धि के कारण मनुष्य में शक्ति भी वृद्धिंगत होती है।
आइये सनातन संस्कृति के धर्म आयामों को हम परंपराओं के साथ साथ वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी समझें और हर्षोल्लास से सपरिवार ईष्ट मित्रों के साथ इस तरह मनाएं कि इस आधुनिक युग में समूचे विश्व को मंगल संदेश प्राप्त हो।
अभी तक हमने जो कुछ भी सुना, वह पारंपरिक उत्सव तथा उसके चीरस्थायी मुल्यों के बारे में था। आइये अब हम एक प्रयास यह करते हैं कि इन त्यौहारों का आधुनिक मानवी जीवन पद्धति से सरोकार कैसा है। 
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक परम पूजनीय डॉ केशव बलिराम हेडगेवार जी ने संघ का प्राकृतिक उद्देश्य विदित किया है, वो है राष्ट्र भक्ति, राष्ट्र के प्रति एकात्म भाव और संवेदना। हमारे उत्सव इस एकात्म भाव को पूरक हैं और यही कारण है कि वे आज तक अबाधित है। देश को तथाकथित स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद वैश्विक आधुनिकीकरण का प्रभाव भारतीय समाज पर भी पड़ा है। परंतु हमारी परंपराओं का अस्तित्व इन त्यौहारों की वजह से दृगोचर है। सामाजिक समरसता यह जो संघ का मूलमंत्र है उसे ऐसे त्यौहार शक्ति भी देते हैं और हिंदुओं में एकत्व की भावना को भी दृढ़ करते हैं।
परम पूजनीय श्रीमान गोलवलकर गुरूजी तथा परम पूजनीय बालासाहेब देवरस जी की संघ के विषय में प्रसारित अनेकों साहित्य कृतियों से यह स्पष्ट होता है कि पूर्वापार चली आ रही कुप्रथाओं के कारण सशक्त हिंदु समाज का गठन नहीं हो पाया है और इसलिए संघ शक्ति का मूल तत्व ही उन्होंने सामाजिक समरसता निश्चित किया है। पूजनीय सरसंघचालक मोहनराव भागवत भी अपने विचार प्रदर्शित करते समय एकात्म भाव को बल देते हैं। उनका दृष्टिकोण तो इतना व्यापक है कि वे बड़ी स्पष्टता से हमें अवगत कराते हैं कि संपूर्ण भरतखण्ड में बसने वाले मानवी एक ही संस्कृति के वंशज हैं और उन्हें चाहे कोई कितना ही तोड़ने की कोशिश करें, वे भिन्न नहीं ठहराये जा सकते हैं। जब हमारे पूजनीय सरसंघचालक हमें यह विचार देते हैं तो उसकी व्यापकता धर्म विहीन, जाति विहीन भारतीय समाज को प्रतिपादित करती हैं। तो हमारा संघ स्वयंसेवकों का आद्य कर्तव्य बनता है कि हम अपनी विचार प्रणाली से इस उद्देश्य को समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाएं और वैश्विक एकात्मता की नींव पुख्ता करने में सहयोग करें। 
तील और गुड़ मिलकर जो मिठास और स्वास्थ्य वर्धक गुणविशेष प्रकट करते हैं, आइये हम भी अपनी जीवनशैली और संघ संस्कारों को मिला कर एक अभेद्य भारतीय समाज, राष्ट्र हित को अपना परिधान बनाकर विश्व में शांति प्रियता की मिठास प्रदान करने वाला मानवी समूह बनने का संकल्प लें। 
सर्वेपि सुखिन: सन्तु, सर्वे सन्तु निरामया
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चित दु:ख भाग्भवेत।
पुनः एक बार मैं आप सभी महानुभावों को मकर संक्रांति के पावन पर्व पर हार्दिक शुभकामनाएं देता हूं और आप के उत्तम स्वास्थ्य की कामना करता हूं। 
जय श्री राम

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