Thursday, 27 January 2022

पांच राज्यों के चुनाव और बदलते रंग

वैसे तो हमारे देश में प्रतिवर्ष किसी न किसी इकाई के चुनाव चलते ही रहते हैं और भारत का समाचार माध्यम लगता है इसी प्रक्रिया के कारण जीवित है। अन्यथा भारतीय जर्नालिस्ट भूखे रह जाएंगे। अस्तु!
मेरे आज के लेख का मूल उद्देश्य है चुनाव के मौसम में हर दिन घटने वाली अजीबोगरीब परिस्थितियां और उनके परिप्रेक्ष्य में आम जनता का आकलन। 
एक तरफ भारत के विद्यमान प्रधानमंत्री है जो अहोरात्र भारत का विकास, भारत की सुरक्षा, भारत का वैश्विक स्तर पर महत्व तथा भारत के सामान्यातिसामान्य मानवी के जीवन स्तर में सुधार की चिंता करते हैं तो दूसरी तरफ यहां का मिडिया है जो दिन-रात जातीय समीकरणों को सामान्य मानवी के मस्तिष्क पर चिन्हित करने के अथक प्रयास में लगा रहता है। कुछ कमी रह जाती है तो कभी न खत्म होने वाली हड्डी अर्थात महंगाई का राग अलापने में कोई कसर नहीं रखता है। सबसे दुखदाई वास्तव यह है कि हम भी इन खबरों को बडे चाव से देखते-सुनते है। स्वतंत्रता के ७५ वर्ष पूर्ण होने को है और हम आज तक स्वतंत्रता इस शब्द की संज्ञा से अनभिज्ञ हैं। जात-पात का विष इतना प्रभावी निष्पन्न होता है कि हम उसके नशे में चूर देश भक्ति, देश के प्रति हमारा दायित्व तथा सामायिक उन्नति को अंधेरे में धकेल कर क्षूद्र विचारों को चिपक जाते हैं। 
७० वर्षों से चली आ रही इस घिनौनी आदत से क्या हम कभी बाज नहीं आएंगे? क्या हम कभी उन नेताओं की भर्त्सना नहीं करेंगे जो चुनाव के
आते ही गिरगिट से भी ज्यादा फूर्ति से अपने रंग बदलते है। वारांगना भी इतनी जलद गती से अपना इमान नहीं बदलती होगी जितनी गती से ये संधिसाधू-स्वार्थावलंबी-देशद्रोही-समाजद्रोही नेता बदल जाते है। 
हां, आवश्यकता है कि हम अपने आप को बिकाऊ बनने से रोकें। महज़ कुछ रुपए या उपहार के लालच में आकर हमारा शोषण करने वाले धूर्त-लालची-भ्रष्ट तथा अमानवीय व्यवहार करने वालों को चुनकर न दें। गांधी-नेहरू के बाद लालू-मुलायम और हाल के समय में राहुल-अखिलेश-सिद्धू-केजरीवाल जैसे सत्ता पिपासु आपके इर्द-गिर्द दाना लेकर घूम रहे हैं। वे भरसक कोशिश करेंगे कि आपको यह मुफ्त,वह मुफ्त कहकर उन्हें चुनाव में जिताने की गुहार लगाएंगे। लेकिन यह याद रखिए कि ये आप की ही जेब काट कर आपही को दान देने की कसरत करने वाले भेड़िए है। सन २०१४ तक हमारे देश में सत्ता पर काबिज कांग्रेस पार्टी ने लाखों करोड़ रुपयों का कर्ज दुनिया से ले रखा था जिसकी भनक तक हमें नहीं थी। मुफ्तखोरी को प्रधानता कभी मत दीजिए वरना इन नेताओं के एकाउंट तो करोड़ों अरबों डॉलर से भर जाएंगे,मगर हम दो जून रोटी को तरसते रह जाएंगे।
महाभारत में भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को गीता का ज्ञान देते समय कहा था "यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत, अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम। अर्थात, जब जब भी भारत में धर्म का ह्रास होगा दूसरे शब्दों में सत्य सात्विक भाव का अभाव होगा तब तब मैं पुनः पुनः इस भूमि पर अवतरित होऊंगा। क्यों न हम आज यह समझें कि हमें भाई नरेन्द्र मोदी के रूप में भगवान श्री कृष्ण का एक ऐसा निष्ठावान अनुयाई प्राप्त हुआ है जो भारत के बिगड़ते हालात को सुधारने साक्षात श्रीहरि का आशीर्वाद लेकर आया है। उसकी हर कृति से तो मुझे यही प्रतीत होता आया है कि वह एक है जो श्रीहरि के आज्ञानुसार देश को सुधारने में लगा है।
अंत में इतना ही कहना चाहूंगा कि बड़ी प्रतिक्षा के बाद हम विकास के प्रकाशमय पर्व को देख पा रहे हैं, कोई ऐसी गलती ना करें कि फिर हमारे प्रवास की दिशा हमें अनिश्चितकालीन अंधकार में धकेल दें। 
जय हिन्द वन्देमातरम भारत माता की जय कवि'रवि'

0 Comments:

Post a Comment

Subscribe to Post Comments [Atom]

<< Home