शियासी रोटी और हमारा लक्ष्य
कोई सेंक रहा है अपनी रोटी,
शहीदों की चिता पर
कोई बहाता है झुठे आंसू
जाति पाती की खता पर
स्वर्ग सिधार गये वे सारे
जो सपना संजोये थे
इंसान में भाईचारे का
छोड गये है वसियत में
हाथ सर पे... चोरोंका
अब जहाँ
हम जागे है गहरी निंद से
हौसला बनाएं रखना है
पुरी जिद से
जियेंगे अभिमान से
जिलाऍंगे शानसे
इस धरा का हर जीव
अब जीएगा एक ही आन से
मैं हूं इस धरा का
ये धरा मेरी हैं
इरादें हम सबके नेक हैं
ना कोई हेराफेरी हैं
रोशन है 'रवि' आसमां
आस्था के किरणों से
अब मानवता ही बहेगी
दिलों के झरनों से....... दिलों के झरनों से
कवि'रवि'

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