वो पूनम की रात
वो पूनम की रात.....तेरा हाथों में हाथ
अधरों पर सिमटे हुए वादों का साथ
मन ही मन मुस्कुराती तेरी छबी
किसी मंथन में उलझी वो पूनम की रात
वो पूनम की रात..... अनचाहे ढलती गई
सुबह के आभास से प्रीत सिकुड़ती गई
मेरे अंतर में बुन रही थी जो बात
सिले होंठों के भीतर ठिठुरती गई
वो पूनम की रात.... फिर आती हैं
सपने सजाती है दिल में अरमान जगाती हैं
गाहे बगाहे मेरे साथ मेरी छबी
नदिया किनारे उभर आती हैं
वो पूनम की रात......अब धुंधली हो रही है
प्रतिक्षा की आयु भी ढलती जा रही है
पर मन है कि बैठा है बंधाए हुए आस
इस पूनम पर तो होगा उसके आने का एहसास
इस पूनम पर तो होगा उसके आने का एहसास
कवि'रवि'

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