अपना हुनर
ग़ालिब का हुनर ग़ालिब को पता
हम तो सुनाते हैं अपनी खता
रंजो ग़म की नुमाइश
करने वाले तूने
इशरते अहबाव को कभी
अजमाया ही नहीं
साक़ी से खतावार तू
रिंदों से भी नाराज़
महफ़िल में चढ़े बाज़ को
कभी जाना ही नहीं
अश्कों को सहेजता रहा
रोशन न रहा तेरा आज
के वफ़ा का अहसास कभी
दिल में संजोया ही नहीं
फितरते मैख्वार जाहिर है 'रवि'
ग़मख्वार को जन्नत
क्योंकर नसीब ही नहीं
कवि'रवि'

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