श्याम तुम्हारे अधर की बन्सी
श्याम तुम्हारे अधर की बन्सी
नादमधुर सुर को जन्माती
सुनकर रम्य लय उस धुन की
गोप गोपियां भी भरमाती
श्याम तुम्हारे चतुर जिव्हा ने
घोर धुरंधर यूं भरमाये
ना करते जो नमन किसी को
तुम्हें भजने में नहीं शर्माएं
श्याम तुम ही हो जग जन जीवन
तुमही सांसें तुमही चितवन
श्याम तुम्हारे बिन सब "छाया" (अंधकार)
वृथा 'कृतार्थ' सब मोह माया
कवि'रवि'

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