Tuesday, 19 April 2022

रिश्तों की रवायत

ईन्सान को ईन्सान बनाने की जुगत पाई जाये
कोई औरही भगवान की व्यवस्था कराई जाये
युं तो हजारों हो गये पत्थर को तराशने वाले
अब के ईन्सानी फितरत को तराशा जाये
बदलना है अगर इस जमाने का उसूल
जीवन के हर तबके को सुधारा जाये
कोई कहें न कहें कुदरत हिसाब करती हैं
अपनों की भलाई में खुद को भुलाया जाये
के रिश्ते होते हैं निभाने के लिए 'रवि'
रिश्तों की गांठ में पेंच पड़ने न दिया जाये
कवि 'रवि'

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