गज़ल
इश्के मैकदा क्यों बार-बार हसरत जगाता है
चाहे किसी गली से गुज़रूं मैकदा ही आता है
जलवा शराब में है तो पियाला क्यों झूमता नहीं
कितने मैख्वार इर्दगिर्द साकी पे असर आता नहीं
इश्के तमन्ना और ये तन्हाई का आलम
समां ए महफिल मुझे क्यों कर भाता नहीं
है आग तो दिल में शमा एक जला कर रख 'रवि'
अश्कों का बहना अक्सर जज्बों को भाता नहीं
बेकरारी झुलसने की परवाने की फितरत है
चर्चा ए मुहब्बत उसे अंगार तक लाता नहीं
कवि 'रवि'
खामोशी एक पैगाम बन गई यारों
नज़र इन्तेक़ाम बन गई यारों
मैकदे की दहलीज़ तक पहुंचें भी नहीं
चर्चा सरेआम बन गई यारों
के अब आशना है दिल अदबगोई से
गूफ्तगू करता है दिल तलबगोई से
मैं मेरा दिल मेरा आलमे तन्हाई
अक्सर उलझते हैं साफगोई से
आंख भर आई तो जाम छलका
पैमाना ऐ इश्क इस तरह छलका
न दवा न दुआ भी काम आईं
दो बूंदों से क्यों कर सैलाब छलका
कवि 'रवि'