Friday, 23 February 2024

गज़ल

अब अश्क भी पलकों से टकराके बिखर जाते है
वो लम्हे जो याद आते है जाने किधर जाते है
रुके रुके से वो जज़बात सांसों का धागा पकड़ कर
जाने कैसे रू-ब-रू होते ही उतर जाते है 
क्या बात है के बात होती कुछ भी नहीं 
वो मंज़र फिर भी अनायास नजरों में उतर जाते है 
ना आशना तू रकीबों से 'रवि' अल्फाज़ गंवाया न कर
तेरी आशनाई के सरे ग़म में कितने महबूब बिखर जाते है
कवि 'रवि'

Friday, 16 February 2024

इश्के मैकदा

 इश्के मैकदा क्यों बार-बार हसरत जगाता है

चाहे किसी गली से गुज़रूं मैकदा ही आता है

जलवा शराब में है तो पियाला क्यों झूमता नहीं

कितने मैख्वार इर्दगिर्द साकी पे असर आता नहीं

इश्के तमन्ना और ये तन्हाई का आलम

समां ए महफिल मुझे क्यों कर भाता नहीं 

है आग तो दिल में शमा एक जला कर रख 'रवि'

अश्कों का बहना अक्सर जज्बों को भाता नहीं

बेकरारी झुलसने की परवाने की फितरत है

चर्चा ए मुहब्बत उसे अंगार तक लाता नहीं


कवि 'रवि'

Friday, 9 February 2024

शेर ए-दिले नासाज़

खामोशी एक पैगाम बन गई यारों

नज़र इन्तेक़ाम बन गई यारों

मैकदे की दहलीज़ तक पहुंचें भी नहीं

चर्चा सरेआम बन गई यारों


के अब आशना है दिल अदबगोई से

गूफ्तगू करता है दिल तलबगोई से

मैं मेरा दिल मेरा आलमे तन्हाई 

अक्सर उलझते हैं साफगोई से 


आंख भर आई तो जाम छलका

पैमाना ऐ इश्क इस तरह छलका

न दवा न दुआ भी काम आईं

दो बूंदों से क्यों कर सैलाब छलका 

कवि 'रवि'