Thursday, 23 May 2024

खोज

ढूंढता रहता हूं यारों क्या कमी मुझमें रही 
सोचता हूं पूरी कर लूं जिंदगी और ना रही 
एक अफसाना अधूरा जो कभी लिख्खा नहीं 
रंजो ग़म की वो तपिश अब जिगर में ना रही 
याद आता है जब दर्दो अलम उस रात का 
एक सनक सी गूंजती है बाकी कसक अब ना रही 
ज़ख्मे जीगर को ना चाहिए कोई दवा 
हो भी गर हमदर्द, काम की कोई दुआ अब ना रही 
मेरी वहशत का मैं वारिस बाकी कुछ ना है 'रवि'
जल चुका जब आशियां फरियाद कोई ना रही 
कवि 'रवि' 

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