खोज
ढूंढता रहता हूं यारों क्या कमी मुझमें रही
सोचता हूं पूरी कर लूं जिंदगी और ना रही
एक अफसाना अधूरा जो कभी लिख्खा नहीं
रंजो ग़म की वो तपिश अब जिगर में ना रही
याद आता है जब दर्दो अलम उस रात का
एक सनक सी गूंजती है बाकी कसक अब ना रही
ज़ख्मे जीगर को ना चाहिए कोई दवा
हो भी गर हमदर्द, काम की कोई दुआ अब ना रही
मेरी वहशत का मैं वारिस बाकी कुछ ना है 'रवि'
जल चुका जब आशियां फरियाद कोई ना रही
कवि 'रवि'

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